चोर की दाढ़ी में तिनका: : हड़बड़ी में गड़बड़ी कर बैठे सीएमओ, भविष्य की तारीख का नोटिस थमाकर घिरे साहब!
Shubh Arvind Sharma
Sun, Aug 9, 2026
चोर की दाढ़ी में तिनका: हड़बड़ी में गड़बड़ी कर बैठे सीएमओ, भविष्य की तारीख का नोटिस थमाकर घिरे साहब!

कटघोरा (कोरबा)। राजनीति में सुचिता के प्रतीक रहे पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की प्रतिमा के नाम पर कटघोरा नगर पालिका ने भ्रष्टाचार की जो गंगा उल्टी बहाई है, वह थमने का नाम नहीं ले रही है। ₹14 लाख की कांस्य (ब्रॉन्ज) मूर्ति की जगह पहली ही बारिश में जब कंक्रीट का भंडाफोड़ हुआ, तो अपनी चमड़ी बचाने के लिए प्रशासन ने आनन-फानन में एक ऐसा सरकारी नोटिस जारी कर दिया,जिसे देखकर लोग कह रहे हैं—"सूप बोले तो बोले, छलनी भी बोले जिसमें बहत्तर छेद!"

नगर पालिका के लीक पत्र ने खोला राज, सामने आया बड़ा 'झोलझाल'
इस पूरे महाघोटाले में सबसे बड़ा ट्विस्ट तब आया जब नगर पालिका का एक बेहद गोपनीय पत्र लीक होकर सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। इस लीक पत्र ने पूरे महकमे का राज खोलकर रख दिया है। जो सच अफसर बंद कमरों में दफन करना चाहते थे, वह इस लीक दस्तावेज के जरिए सरेआम चौराहे पर आ गया है। इस पत्र ने साबित कर दिया है कि भ्रष्टाचार को छिपाने के लिए विभाग के भीतर किस कदर कागजी हेराफेरी और 'झोलझाल' का खेल चल रहा था।
भविष्य का निरीक्षण: "ना नौ मन तेल होगा, ना राधा नाचेगी" की तर्ज पर कागजी खानापूर्ति!
इस लीक सरकारी दस्तावेज का सबसे बड़ा सबूत इसकी तारीखें हैं, जो नगर पालिका के अधिकारियों के मानसिक दिवालियेपन को उजागर करती हैं। पत्र जारी होने और साहब के दस्तखत की तारीख 24.07.2026 है, लेकिन पत्र की छाती पर लिखा है कि साहब ने पूरी पलटन के साथ 27.07.2026 को मौके का मुआयना किया था!
यह तो वही बात हो गई कि "चोरी ऊपर से सीनाजोरी"। जो निरीक्षण तीन दिन बाद होना है, उसका फरमान तीन दिन पहले ही टाइप होकर डिस्पैच हो गया। जनता पूछ रही है कि कटघोरा नगर पालिका के सीएमओ साहब के पास कौन सा दिव्य चश्मा है जो वो भविष्य में जाकर भ्रष्टाचार देख आते हैं? साफ है कि अफसरों ने एसी कमरों में बैठकर अंधा बांटे रेवड़ी, फिर-फिर अपनों को दे वाली तर्ज पर सिर्फ कागजों के पेट भरे हैं।
मुहर पर कांट-छांट: पद की बंदरबांट या जालसाजी?
घोटाले की इसे बहती गंगा में केवल तारीख ही नहीं, साहब की सरकारी मुहर भी सवालों के घेरे में है। हस्ताक्षर के नीचे जो सील ठोंकी गई है, उसमें पहले "मुख्य नगर पालिका अधिकारी" छपा हुआ था, जिसे काले पेन से लीपापोती करके "राजस्व" बनाने का भौंडा प्रयास किया गया है।
यह "काट की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती" वाली कहावत को चरितार्थ करता है। जब साहब के पास अपने असली पद की मुहर तक नहीं है, तो वो इतनी बड़ी कार्रवाई का स्वांग क्यों रच रहे थे? इस तरह की कांट-छांट चीख-चीख कर कह रही है कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है।
जवाब देने से बच रहे जिम्मेदार: सीएमओ ने मीडिया से फेरा मुंह
इस गंभीर प्रशासनिक लापरवाही और लीक पत्र के संबंध में जब मुख्य नगरपालिका अधिकारी (सीएमओ) का पक्ष जानने के लिए उनसे संपर्क करने का प्रयास किया गया, तो वे फोन उठाना वाजिब नहीं समझे। संवाददाताओं द्वारा कई बार फोन करने और संपर्क साधने की कोशिश की गई, लेकिन साहब ने कॉल रिसीव करना ठीक नहीं समझा। जिम्मेदार अधिकारी का इस तरह मीडिया के तीखे सवालों से मुंह छिपाना यह साफ बयां करता है कि विभाग के पास इस 'झोलझाल' का कोई जवाब नहीं है।
ठेकेदार भी हुआ अंडरग्राउंड, फोन कॉल्स से बनाई दूरी
"एक तो चोरी, ऊपर से सीनाजोरी" का खेल सिर्फ अधिकारी ही नहीं, बल्कि आरोपी ठेकेदार भी बखूबी खेल रहा है। इस लीक पत्र के सामने आने और मूर्ति निर्माण की घटिया गुणवत्ता के मामले में जब सच्चाई जानने हेतु ठेकेदार मनोज कुमार अग्रवाल से संपर्क किया गया, तो उन्होंने भी फोन नहीं उठाया। मीडिया द्वारा वस्तुस्थिति स्पष्ट करने के लिए उनसे बार-बार संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन ठेकेदार से संपर्क नहीं हो पाया। अधिकारी की तरह ठेकेदार का भी फोन न उठाना और चुप्पी साध लेना यह साबित करता है कि "चोर-चोर मौसेरे भाई" की तर्ज पर इस घोटाले का ताना-बाना बुना गया है।
क्या आदेश फर्जी है या ठेकेदार को 'अभयदान' देने की 'नूराकुश्ती'?
चूंकि यह पत्र आधिकारिक डिस्पैच नंबर (क्रमांक 1113/तक.शा./न0पा0प0/2026) के साथ जारी हुआ है, इसलिए इसे पूरी तरह फर्जी तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन यह विभाग की घोर लापरवाही और मिलीभगत का जीता-जागता सबूत जरूर है।
जब युवा कांग्रेस और विपक्षी दलों ने सड़क पर उतरकर ईंट से ईंट बजानी शुरू की, तो जनआक्रोश से डरे अफसरों ने आनन-फानन में बिना सोचे-समझे बैक-डेट में यह नोटिस तैयार कर दिया। नतीजा यह हुआ कि "हड़बड़ी में गड़बड़ी" हो गई और अधिकारी खुद अपने ही बुने जाल में फंस गए, जिसका भंडाफोड़ इस लीक पत्र ने कर दिया।
ठेकेदार की तो पांचों उंगलियां घी में!
कानून के जानकारों का कहना है कि यह नोटिस ठेकेदार के लिए किसी 'कानूनी कवच' से कम नहीं है। इस लचर और विरोधाभासी कागजी टुकड़े के दम पर ठेकेदार किसी भी कोर्ट से इस कार्रवाई पर स्टे ले आएगा। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या विभाग ने जानबूझकर ऐसा त्रुटिपूर्ण नोटिस बनाया ताकि "सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे" यानी जनता का गुस्सा भी शांत हो जाए और पर्दे के पीछे से भ्रष्ट ठेकेदार की पीठ भी थपथपा दी जाए? अब देखना यह है कि लीक पत्र से मचे इस हड़कंप, सीएमओ और ठेकेदार की इस रहस्यमयी चुप्पी के बाद उच्च अधिकारी किस पर गाज गिराते हैं।
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कोरबा कटघोरा
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