कटघोरा में अटल मूर्ति घोटाला: : बड़ी मछलियों को अभयदान और छोटे प्यादे की बलि; प्रशासन की इस 'लीपापोती' पर कब तक खामोश रहेगी जनता?
Shubh Arvind Sharma
Wed, Aug 5, 2026
कटघोरा में अटल मूर्ति घोटाला: बड़ी मछलियों को अभयदान और छोटे प्यादे की बलि; प्रशासन की इस 'लीपापोती' पर कब तक खामोश रहेगी जनता?
इंजीनियर के वायरल पत्र ने खोली मुख्य नगरपालिका अधिकारी (CMO) के काले कारनामों की पोल, फिर भी प्रशासन क्यों बना हुआ है 'अंधा और बहरा'?
7 तारीख को SDM कार्यालय के सामने रोड पर होगा कांग्रेसी नेता विकास सिंह का एक दिवसीय अर्धनग्न उग्र प्रदर्शन; पूर्व में आंदोलन कुचलने के पीछे 'कुनबे की नीति' या 'प्रशासन की चाल'?

कटघोरा (कोरबा) छत्तीसगढ़ के कटघोरा नगर पालिका परिषद में हुआ ‘अटल मूर्ति घोटाला’ इस समय सियासी गलियारों से लेकर चाय की टपरियों तक सुलग रहा है। भारत रत्न स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी की प्रतिमा स्थापना में हुए इस काले कारनामे ने व्यवस्था की नीयत को पूरी तरह नंगा कर दिया है। सबसे हैरान और गुस्सा दिलाने वाली बात यह है कि जहां पक्ष, विपक्ष और स्थानीय संगठन एक सुर में सभी गुनहगारों को कठोर सजा देने की मांग कर रहे हैं, वहीं जिला प्रशासन इस महाघोटाले पर 'पर्दा डालने' की पुरजोर कोशिश में क्यो जुटा है? इतने गंभीर मामले में 'हाथी को छोड़ पूंछ पकड़ने' जैसी प्रशासनिक चालाकी देखकर जनता का खून खौल उठा है।
सवाल सीधा और तीखा है: जब मलाई सबने मिलकर खाई, तो सिर्फ एक अदने से इंजीनियर पर गाज गिराकर बाकी सफेदपोशों और बड़े मगरमच्छों को 'अभयदान' क्यों दिया जा रहा है?

इंजीनियर के 'वायरल पत्र' से फूटा भंडाफोड़: CMO की भूमिका शीशे की तरह साफ
प्रशासनिक लीपापोती के बीच इस महाघोटाले में एक बेहद चौंकाने वाला मोड़ आ गया है। सस्पेंड किए गए सब-इंजीनियर के एक वायरल पत्र ने इस पूरे भ्रष्टाचार की हकीकत को जनता के सामने लाकर रख दिया है। इस पत्र ने साफ कर दिया है कि 14 लाख रुपये के इस फर्जीवाड़े में असली 'मास्टरमाइंड' कोई और नहीं, बल्कि मुख्य नगरपालिका अधिकारी (CMO) हैं,जो मूर्ति निरीक्षण के दौरान उपस्थित थे।
इस वायरल पत्र के सार्वजनिक होने के बाद भी जिला प्रशासन आखिर 'अंधा, बहरा और गूंगा' क्यों बना हुआ है? जब छोटे कर्मचारी ने लिखित सबूतों और पत्राचार के जरिए सीएमओ की संलिप्तता और दबाव को उजागर कर दिया, तो फिर प्रशासन किस दबाव में आकर मुख्यमंत्री और वरिष्ठ अधिकारियों की आंखों में धूल झोंक रहा है? क्या सीएमओ पर कार्रवाई करने से प्रशासन के आला अधिकारियों के अपने हाथ जलने का डर है? जनता अब पूछ रही है कि इस स्पष्ट सबूत के बाद भी CMO की बर्खास्तगी और गिरफ्तारी से पैर क्यों पीछे खींचे जा रहे हैं?

व्यवस्था की चूलें हिलाने 7 तारीख को उतरेगा जन-आक्रोश: खुले आसमान के नीचे 'अर्धनग्न' प्रदर्शन
प्रशासन के इस पक्षपातपूर्ण रवैए, सीएमओ को बचाने की साजिश और लीपापोती के खिलाफ अब आर-पार की जंग का ऐलान हो चुका है। इसी कड़ी में कांग्रेसी नेता विकास सिंह ने प्रशासन की तानाशाही के खिलाफ सबसे बड़ा मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने दोटूक लहजे में चेतावनी दी है कि वे आगामी 7 तारीख को कटघोरा SDM कार्यालय के सामने मुख्य मार्ग (रोड) पर एक दिवसीय अर्धनग्न उग्र प्रदर्शन करेंगे।
विकास सिंह का कहना है कि जब प्रशासन की नीयत और भ्रष्टाचार पूरी तरह नंगे हो चुके हैं, तो अब विरोध भी उसी आक्रामक अंदाज में होगा। इस अनोखे और उग्र प्रदर्शन की खबर से ही स्थानीय प्रशासन के 'हाथ-पांव फूलने' लगे हैं। 7 तारीख को होने वाले इस प्रदर्शन में बड़ी संख्या में स्थानीय जनमानस और कार्यकर्ताओं के जुटने की संभावना है, जो सीधे तौर पर सड़क ठप कर भ्रष्ट सीएमओ और असली दोषियों की निष्पक्ष जांच और तत्काल गिरफ्तारी की मांग करेंगे।

बड़ा सवाल: आंदोलन कुचलने के पीछे 'कुनबे की नीति' या 'प्रशासन की चाल'?
इस आंदोलन को लेकर प्रशासन के भीतर मची खलबली के बीच एक पुराना इतिहास भी चर्चा में आ गया है। पूर्व में भी विकास सिंह के धरना आंदोलनों को बर्बरता से दबाने और कुचलने का प्रयास किया गया था। आज कटघोरा की जनता के बीच यह सवाल सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न बनकर खड़ा है कि विकास सिंह के संघर्ष को दबाने के पीछे आखिर किसकी शह थी—यह 'कुनबे की अंदरूनी नीति' थी या फिर 'प्रशासन की सोची-समझी चाल'?
* कुनबे की नीति का शक: क्या सत्ता और रसूखदारों के उस खास कुनबे (सिंडिकेट) ने अपनी आपसी साठगांठ को बचाने के लिए यह नीति बनाई थी कि जो भी भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाए, उसका गला घोंट दिया जाए? क्या अपने 'अपनों' के पापों को छुपाने के लिए कुनबे ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी?
* प्रशासन की चाल का अंदेशा: या फिर यह पूरी तरह से प्रशासनिक अधिकारियों की वो चाल थी, जिसके तहत वे अपनी नाकामियों और भ्रष्टाचार की फाइलों पर पर्दा डालने के लिए खाकी और सरकारी हनक का इस्तेमाल कर रहे थे?
वजह चाहे जो भी हो—चाहे वह रसूखदार कुनबे का दबाव हो या प्रशासन की अपनी शातिर चाल—इस दमनकारी नीति ने जनता के भीतर जो लावा दबाया था, वह इस 'अटल मूर्ति घोटाले' के बाद अब फूटने को तैयार है। विकास सिंह और उनके समर्थकों का साफ कहना है कि इस बार प्रशासन चाहे जितना दमन चक्र चला ले, वे पीछे हटने वाले नहीं हैं।
'बलि का बकरा' बनाने का पुराना खेल
प्रशासन का यह रवैया साफ़ दिखाता है कि वह 'चोर को छोड़, लाठी को पीटने' का काम कर रहा है। करोड़ों की हेराफेरी और घटिया निर्माण के इस खेल में एक कनिष्ठ अभियंता (इंजीनियर) को 'बलि का बकरा' बना दिया गया है ताकि जनता का गुस्सा शांत हो जाए और ऊपर बैठे आकाओं की कुर्सी बची रहे।
जानकार पूछते हैं कि क्या एक अदने से इंजीनियर की इतनी हैसियत होती है कि वह अकेले पूरे टेंडर की धज्जियां उड़ा दे और तांबे की जगह सीमेंट की मूर्ति खड़ी करवा दे?
* 'सैंया भए कोतवाल तो अब डर काहे का': क्या इस घोटाले के पीछे उसी प्रभावशाली कुनबे और सीएमओ का सीधा हाथ है, जिसके इशारे पर यह सब हुआ और अब उन्हें बचाने के लिए पूरी प्रशासनिक मशीनरी को काम पर लगा दिया गया है?
* 'ऊपर की आमदनी' का हिस्सा कहाँ गया? टेंडर पास करने से लेकर भुगतान की फाइलों पर दस्तखत करने वाले बड़े अफसरों की आंखें उस वक्त क्यों मूंद गई थीं? क्या उनकी जेबें गरम नहीं की गईं?

पक्ष-विपक्ष एकजुट, फिर भी प्रशासन 'कान में तेल डाले' बैठा है
इस मामले में सबसे दिलचस्प मोड़ यह है कि राजनीति में 'एक-दूसरे की गर्दन नापने' वाले सत्तापक्ष (भाजपा) और विपक्ष (कांग्रेस), दोनों के नेता इस बार जनता के साथ खड़े हैं। भाजपा जिलाध्यक्ष से लेकर कांग्रेसी नेताओं तक सभी घोटाले में शामिल भ्रष्ट अधिकारी ठेकेदार पर कड़ी कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। स्थानीय संगठनों ने भी कमर कस ली है और सड़कों पर 'ईंट से ईंट बजाने' की तैयारी कर चुके हैं, जिसकी बड़ी शुरुआत 7 तारीख को होने जा रही है।
इसके बावजूद, प्रशासन 'चिकने घड़े' की तरह व्यवहार कर रहा है। एक छोटे कर्मचारी को सस्पेंड करके प्रशासन ऐसा दिखा रहा है मानो उसने 'गंगा नहा ली' हो। लेकिन जनता अब 'दूध की जली' है, वह इस प्रशासनिक नौटंकी, वायरल पत्र के सच और कुनबे की साज़िशों को अच्छी तरह समझती है।
इन तीखे सवालों का जवाब कौन देगा?
'चिराग तले अंधेरा' क्यों? जब सब-इंजीनियर का वायरल पत्र चिल्ला-चिल्लाकर मुख्य नगरपालिका अधिकारी (CMO) का नाम ले रहा है, तो जांच एजेंसियों को वो चेहरा दिखाई क्यों नहीं दे रहा?
* मुख्य ठेकेदार पर मेहरबानी क्यों? घटिया मूर्ति खड़ी करने वाले और जनता के पैसे पर 'डाका डालने' वाले ठेकेदार को अब तक सलाखों के पीछे क्यों नहीं भेजा गया? क्या उसके ऊपर सीएमओ या किसी रसूखदार का 'वरदहस्त' है?
* 'हाथ कंगन को आरसी क्या': जब भ्रष्टाचार और कागजी सबूत साफ-साफ दिख रहे हैं, तो मामले की स्वतंत्र और उच्च स्तरीय जांच कराने से प्रशासन के पैर क्यों पीछे खिंच रहे हैं?

'काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती'
प्रशासन, भ्रष्ट अफसरशाह और पर्दे के पीछे बैठा कुनबा यह बात गांठ बांध ले कि 'काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती'। एक अदने से इंजीनियर पर कार्रवाई का यह 'छलावा', आंदोलनों को कुचलने की पुरानी चालें और सीएमओ को बचाने का यह नाटक अब चलने वाला नहीं है। अटल जी जैसी महान शख्सियत के नाम पर भ्रष्टाचार करने वालों को अगर बचाए रखने की कोशिश की गई, तो यह प्रशासनिक घमंड जल्द ही जनता के आक्रोश की आंधी में 'तिनके की तरह उड़ जाएगा'। 7 तारीख को होने वाला विकास सिंह का अर्धनग्न उग्र आंदोलन प्रशासन और उस खास कुनबे की चूलें हिलाने के लिए तैयार है, और जनता अब 'दूध का दूध और पानी का पानी' करवा कर ही दम लेगी।
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