भ्रष्टाचार की 'कटघोरा' में कैद जनता: : जब 'पवन' थम गए और 'इश्तियाक-रतन' ने ओढ़ ली खामोशी, तो ओछी सियासत के 'दिन दूने-रात चौगुने' बढ़े!
Shubh Arvind Sharma
Wed, Aug 19, 2026
भ्रष्टाचार की 'कटघोरा' में कैद जनता: जब 'पवन' थम गए और 'इश्तियाक-रतन' ने ओढ़ ली खामोशी, तो ओछी सियासत के 'दिन दूने-रात चौगुने' बढ़े!
कटघोरा। आज की राजनीति चमचमाती गाड़ियों के काफिले, सोशल मीडिया की झूठी वाहवाही और हाई-टेक पीआर (PR) एजेंसियों के दम पर 'ऊंची दुकान और फीका पकवान' बनकर रह गई है। कटघोरा की सियासत में आज जो 'अंधेर नगरी, चौपट राजा' जैसी स्थिति बनी हुई है, उसे देखकर पुराना दौर बरबस ही याद आता है। एक वो दौर था जब नेतागिरी का मतलब सिर्फ और सिर्फ जनता की निस्वार्थ सेवा होता था और नेताओं के रसूख का अंदाजा उनके बैंक बैलेंस से नहीं, बल्कि उनके एक इशारे पर जुटने वाले जनसैलाब से लगाया जाता था।

आज कटघोरा की राजनीति के जो पुराने स्तंभ मुख्यधारा से पूरी तरह कटकर शांत बैठे हैं, एक समय था जब पूरे क्षेत्र में उनकी तूती बोलती थी और विरोधी भी उनके सामने दुम दबाकर चलते थे।

जब अलग-अलग घाट का पानी पीकर भी, दिल जनता से जुड़े थे
कटघोरा की राजनीतिक फिजां में कांग्रेस के कद्दावर नेता इश्तियाक भाई को लोग एक सच्चे किसान नेता के नाम से पूजते थे। इसी फेहरिस्त में समर्पित व वरिष्ठ कांग्रेसी नेता रतन मित्तल का नाम आता है, जो बदलती परिस्थितियों पर बेहतर और अचूक नियंत्रण रखने की कला में माहिर थे।
दूसरी ओर, भाजपा के दो मजबूत चेहरों ने अपने तेवरों से कटघोरा का इतिहास लिखा था। पवन अग्रवाल, जिनका चुनावी बिगुल ही "आखरी सांस तक लड़ने का वादा" था, और उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाले पवन गर्ग, जो हमेशा "अभी नहीं तो कभी नहीं" के आक्रामक नारे के साथ जनता के हक के लिए मैदान में कूद पड़ते थे। इन नेताओं की राजनीतिक विचारधाराएं भले ही अलग-अलग थीं, लेकिन कटघोरा की जनता के हित के मामले में सब एक ही थाली के चट्टे-बट्टे (एकजुट) थे।

'हाथ तंग, पर दिल बुलंद'... वो दौर जब राजा और रंक में फर्क न था
इन दिग्गजों के दौर में आज की तरह नेताओं के पास तिजोरियां और आलीशान दफ्तर नहीं होते थे। पैसे कम थे, शान-शौकत भी कम थी, लेकिन जनता चैन की बंसी बजाती थी। वजह साफ़ थी— ये नेता जनता की हर नब्ज़ से वाकिफ थे और उनके सुख-दुख से सीधा नाता रखते थे। यही कारण है कि इनके दौर में ना कभी कोई बड़ा आंदोलन हुआ और ना ही कभी जनता ने सड़कों पर उतरकर विरोध की लाठी उठाई। जब नियत साफ़ हो, तो बड़े से बड़े विवाद भी मिल-बैठकर पानी के बुलबुले की तरह शांत हो जाते थे।

आज भ्रष्टाचार का 'खुला खेल फर्रुखाबादी', मूलभूत सुविधाओं का जनाजा!
मगर अफ़सोस, आज वक्त का पहिया ऐसा घूमा कि कटघोरा की पूरी व्यवस्था भ्रष्टाचार और ओछी राजनीति की भेंट चढ़ चुकी है। आज यहां भ्रष्टाचार का 'खुला खेल फर्रुखाबादी' चल रहा है। सड़कें गड्ढों में तब्दील हैं, बूंद-बूंद पानी के लिए हाहाकार है, और बिजली-सफाई जैसी बुनियादी सुविधाओं का पूरी तरह जनाजा निकल चुका है। विकास के बड़े-बड़े दावे सिर्फ 'कागजी घोड़े' साबित हो रहे हैं और जमीनी हकीकत जनता के आंसू बहा रही है।
नए 'साहबों' से दूरी, मुसीबत में आज भी पुरानी चौखट ही सहारा
इस बदहाली के बीच सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि संकट से घिरी कटघोरा की जनता आज के इन नए नवेले 'साहबों' का दरवाजा खटखटाना भी गंवारा नहीं समझती। जनता जानती है कि नए दौर के नेताओं के पास सिर्फ 'घड़ियाली आंसू' हैं। इसलिए, जब भी किसी नागरिक पर कोई बड़ी मुसीबत आती है, तो पैर खुद-ब-खुद इश्तियाक भाई, रतन मित्तल, पवन अग्रवाल और पवन गर्ग की चौखट की तरफ बढ़ जाते हैं। नए नेताओं के सुरक्षा घेरे को ठेंगा दिखाकर, जनता की उम्मीदें आज भी इन्हीं पुराने शेरों के भरोसे पर टिकी हैं।
जनता को भीतर ही भीतर खा रहा है एक बड़ा सवाल: 'अब क्यों साधे हैं मौन?'
लेकिन इस पूरी बदहाली के बीच कटघोरा की जनता को एक मलाल कांटे की तरह चुभता है। आज के इस दौर में इन ईमानदार और कद्दावर नेताओं का राजनीतिक रूप से जमींदोज हो जाना जनता को बुरी तरह खटकता है। लोगों के दिलों में आज एक ही टीस है, एक ही सुलगता हुआ सवाल है जो उन्हें भीतर ही भीतर घुन की तरह खाए जा रहा है— कि जब पूरा सिस्टम सड़ चुका है, तो ये दिग्गज आज इस भ्रष्ट तंत्र के खिलाफ 'भीष्म पितामह' की तरह मौन क्यों साधे बैठे हैं? जनता चाहती है कि उनकी हक़ की लड़ाई के लिए ये पुराने महारथी एक बार फिर मैदान में उतरें, लेकिन इनकी यह रहस्यमयी खामोशी लोगों को हैरान-परेशान कर रही है।
नए नवेले नेताओं के लिए 'आईना' है इन दिग्गजों का इतिहास
इन नेताओं का जीवन आज की युवा पीढ़ी और पद के नशे में चूर राजनेताओं के लिए एक आईना है। यह रिपोर्ट इस बात की गवाह है कि सत्ता की कुर्सी आज है तो कल नहीं, लेकिन जो सादगी और निस्वार्थ रिश्ता इन दिग्गजों ने कटघोरा की जनता के साथ बनाया, वह आज की इस भ्रष्ट और हाई-टेक राजनीति के दौर में भी अंगद का पैर है, जिसे कोई हिला नहीं सकता।
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