कटघोरा को जिला बनाने की मांग: : विपक्ष में 'शेर' बनने वाले अल्पसंख्यक मोर्चा जिलाध्यक्ष उत्तम रंधावा अपनी सरकार आते ही 'भीगी बिल्ली' बने!
Shubh Arvind Sharma
Fri, Jul 31, 2026
कटघोरा को जिला बनाने की मांग: विपक्ष में 'शेर' बनने वाले अल्पसंख्यक मोर्चा जिलाध्यक्ष उत्तम रंधावा अपनी सरकार आते ही 'भीगी बिल्ली' बने!
कटघोरा। विपक्ष में रहकर जनता के मुद्दों पर आसमान सिर पर उठाने वाले नेता, सत्ता की मलाई मिलते ही कैसे दुपक कर बैठ जाते हैं, इसका जीता-जागता सबूत कटघोरा जिला आंदोलन में देखने को मिल रहा है। कल तक जो भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के जिलाध्यक्ष उत्तम सिंह रंधावा कटघोरा को जिला बनाने की मांग को लेकर खून-पसीना एक करने का दम भर रहे थे और भूख हड़ताल पर बैठकर अंगारे उगल रहे थे, आज सूबे में अपनी सरकार आते ही उन्होंने मौन व्रत धारण कर लिया है। जनता अब पूछ रही है कि क्या वह आंदोलन सिर्फ चुनावी वैतरणी पार करने के लिए घड़ियाली आंसू बहाना था?

विपक्ष में था 'अंगार', अब मुंह में 'दही जमा'
अगस्त 2023 का वह दौर सबको याद है, जब सूबे में कांग्रेस की सरकार थी। तब अल्पसंख्यक मोर्चा जिलाध्यक्ष उत्तम सिंह रंधावा ने कटघोरा जिला निर्माण के लिए धरती-आसमान एक कर दिया था। पंडाल सजाकर, भूख हड़ताल पर बैठकर उन्होंने तत्कालीन सरकार की ईंट से ईंट बजाने की कसमें खाई थीं। उस वक्त रंधावा और उनके सहयोगियों के तेवर देखकर लगता था कि वे जिला बनवाकर ही दम लेंगे। लेकिन जैसे ही छत्तीसगढ़ में सत्ता का पासा पलटा और भाजपा की सरकार बनी, उत्तम रंधावा के तेवर हवा हो गए। जो नेता कल तक गला फाड़-फाड़कर दहाड़ रहा था, वह आज अपनी ही सरकार के सामने दुम दबाकर बैठ गया है और उसके मुंह में जैसे दही जम गया है।

स्व. अटल जी की प्रतिमा के अपमान पर भी साधी चुप्पी, जनता ने पूछा सवाल
नेताजी के दोहरे चरित्र का पर्दाफाश सिर्फ जिला आंदोलन तक ही सीमित नहीं है। हद तो तब हो गई जब भाजपा के पितातुल्य और देश के पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी जी की प्रतिमा के अपमान का संवेदनशील मामला सामने आया। अपनी ही पार्टी की सरकार और व्यवस्था के नाक के नीचे हुए इस अपमान पर अल्पसंख्यक मोर्चा जिलाध्यक्ष उत्तम रंधावा ने सांप सूंघने जैसा रवैया अख्तियार कर लिया है। उनके मुंह से एक शब्द तक नहीं फूट रहा है।
जनता आज तीखे सवाल पूछ रही है कि अगर स्व. अटल जी की प्रतिमा का ऐसा अपमान किसी विपक्षी दल की सरकार में हुआ होता, तो क्या उत्तम रंधावा इसी तरह हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते? क्या तब भी उनकी यह चुप्पी बरकरार रह पाती? निश्चित तौर पर तब तक नेताजी सड़कों पर उतरकर आसमान सिर पर उठा चुके होते और राजनीति की रोटियां सेकने के लिए धरना-प्रदर्शन का खेल शुरू हो गया होता। लेकिन आज अपनी सरकार के राज में पूजनीय नेता का अपमान होने पर भी वे आंखें मूंदकर बैठे हैं।

जनता की उम्मीदों पर 'फेरा पानी', रची 'चुनावी स्क्रिप्ट'
कटघोरा की भोली-भाली जनता को लगा था कि भाजपा सरकार आते ही जिला निर्माण की मांग को हरी झंडी मिल जाएगी। लेकिन सत्ता की कुर्सी मिलते ही नेताओं ने जनता की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। स्थानीय नागरिकों और 'कटघोरा जिला बनाओ समिति' का आरोप है कि उत्तम रंधावा का वह अनशन केवल जनता की आंखों में धूल झोंकने और वोट बटोरने का एक शगूफा था। चुनावी फायदा मिलते ही नेताजी ने इस संवेदनशील मुद्दे को ठंडे बस्ते में डाल दिया है।
गिरगिट की तरह रंग बदलने वाले नेताओं से जनता खफा
स्थानीय गलियारों में अब यह चर्चा आम हो चुकी है कि जो नेता विपक्ष में रहकर शेर की तरह दहाड़ते हैं, वे अपनी सरकार आते ही मेमना बन जाते हैं। कटघोरा को जिला बनाने का मुद्दा हो या स्व. अटल जी की अस्मिता का सवाल, आंदोलन की कमान संभालने वाले अल्पसंख्यक मोर्चा जिलाध्यक्ष अब चादर तानकर सो रहे हैं। कटघोरा की जनता अब इन नेताओं की रंग बदलने की राजनीति को अच्छी तरह भांप चुकी है और आने वाले समय में इन्हें आइना दिखाने के लिए पूरी तरह तैयार है।
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कोरबा कटघोरा
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