सियासी भूचाल: कटघोरा में कांग्रेस का 'द्विकोणीय' चक्रव्यूह; : कंवर को पाली-तानाखार भेजा तो 'माया मिली न राम', कटघोरा में ही हैं 'तुरुप का इक्का'
Shubh Arvind Sharma
Mon, Aug 24, 2026
सियासी भूचाल: कटघोरा में कांग्रेस का 'द्विकोणीय' चक्रव्यूह; कंवर को पाली-तानाखार भेजा तो 'माया मिली न राम', कटघोरा में ही हैं 'तुरुप का इक्का'
कटघोरा (कोरबा)। छत्तीसगढ़ की हाई-प्रोफाइल कटघोरा विधानसभा सीट को भाजपा से वापस छीनने के लिए कांग्रेस इस बार 'साम, दाम, दंड, भेद' की रणनीति पर काम कर रही है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि कांग्रेस इस बार किसी भी सिफारिश को दरकिनार कर केवल सामाजिक और आर्थिक रूप से अंगद की तरह पैर जमाने वाले चेहरों पर ही दांव खेलेगी।
आंतरिक सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, कांग्रेस के पास इस समय ऐसे धुरंधर हैं, जो भाजपा के वर्तमान विधायक प्रेमचंद पटेल के रथ के पहिए जाम करने का माद्दा रखते हैं। इस रेस में मुख्य रूप से पुरुषोत्तम कंवर और रतन मित्तल का नाम सबसे आगे चल रहा है।

पाली-तानाखार में कंवर पर दांव: 'आ बैल मुझे मार' साबित हो सकती है कांग्रेस की यह रणनीति
सियासी हलकों में कयास लगाए जा रहे हैं कि आदिवासी पृष्ठभूमि के कारण पुरुषोत्तम कंवर को पड़ोसी सीट पाली-तानाखार से उतारा जा सकता है। लेकिन राजनीतिक पंडितों ने इस पर 'लक्ष्मण रेखा' खींचते हुए कांग्रेस को चेताया है।
* गोंगपा का अभेद्य किला: विशेषज्ञों का दावा है कि पाली-तानाखार में गोंडवाना गणतंत्र पार्टी (GGP) की जड़ें इतनी गहरी हैं कि वहां कंवर के लिए 'लोहे के चने चबाने' जैसी स्थिति होगी।
* त्रिकोणीय मुकाबले में फंसा पेंच: यदि कांग्रेस ने कंवर को कटघोरा से हिलाया, तो वहां उन्हें गोंगपा और भाजपा की दोहरी चक्रव्यूह घेराबंदी का शिकार होना पड़ सकता है। विश्लेषकों के अनुसार, यह दांव कांग्रेस के लिए 'हाथ आए ना भुट्टा, खोया सब कुछ खट्टा' यानी भारी राजनीतिक झटका साबित हो सकता है।

1. पुरुषोत्तम कंवर: कटघोरा की पिच पर कांग्रेस का असली 'तुरुप का इक्का'
समीक्षकों का स्पष्ट मत है कि पुरुषोत्तम कंवर की असली सियासी जमीन सिर्फ और सिर्फ कटघोरा विधानसभा ही है, जहाँ उनके पिता बोधराम कंवर की 6 बार की विधायकी की विरासत आज भी 'दूध का दूध और पानी का पानी' करने का दम रखती है।
* जातियों का ताना-बाना: कटघोरा सामान्य सीट होने के बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों के कंवर (आदिवासी) मतदाता यहाँ 'किंगमेकर' हैं। पुरुषोत्तम कंवर की अपने समाज पर ऐसी पकड़ है कि वे विरोधियों के छक्के छुड़ा सकते हैं।
* संसाधनों की मजबूत कमान: दशकों के राजनीतिक रसूख के कारण इस परिवार का आर्थिक और संगठनात्मक ढांचा बेहद सुदृढ़ है। चुनाव के दौरान विपरीत परिस्थितियों में भी 'बाजी पलटने' और कार्यकर्ताओं में जान फूंकने में कंवर सबसे आगे माने जाते हैं।
जिला मांग बनाम चुनावी शिगूफा: भाजपा के दांव पर भारी जनता की समझ
कटघोरा को पूर्ण जिला बनाने की मांग इस चुनाव में भाजपा के लिए 'सांप-छछूंदर की गति' जैसी बन चुकी है। पूर्व में भले ही भाजपा ने इस मुद्दे पर तत्कालीन कांग्रेस विधायक पुरुषोत्तम कंवर को 'आड़े हाथों' लिया था, लेकिन अब पासा उल्टा पड़ता दिख रहा है।
* कंवर ने पूरी की थी कागजी कसरत: प्रशासनिक जानकारों का कहना है कि किसी भी नए जिले के गठन की कानूनी और राजस्व सीमाओं को तय करने में 5 से 6 साल का लंबा समय लग जाता है। कथित तौर पर पुरुषोत्तम कंवर ने अपने कार्यकाल में इस पूरी जटिल प्रशासनिक प्रक्रिया को अंतिम पड़ाव तक पहुंचा दिया था।
* 'चुनावी मुद्दा महज' मानने लगी जनता: विपक्ष में रहते हुए भाजपा ने जोर-शोर से दावा किया था कि—"हमारी सरकार होती, तो कटघोरा कब का जिला बन गया होता।" लेकिन आज प्रदेश में भाजपा की डबल इंजन सरकार है और स्थानीय विधायक भी भाजपा के हैं, फिर भी कटघोरा जिला बनने की बाट जोह रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों और क्षेत्र के लोगों का अब साफ मानना है कि चुनाव के ठीक पहले यदि भाजपा दबाव में कटघोरा को जिला घोषित कर भी देती है, तो कोई तीर नहीं मार लेगी। जनता अब इसे केवल एक 'चुनावी शिगूफा और वोट बटोरने का स्टंट' मान रही है, क्योंकि असल मुद्दों से ध्यान भटकाना अब मुमकिन नहीं है।

अटल परिसर विवाद और 'ठोस कार्रवाई' का अभाव: जनता का नारा—'जो अटल के नहीं हुए, वो हमारे क्या होंगे!'
भाजपा जो खुद को 'अटल जी के सिद्धांतों की दुहाई देने वाली पार्टी' कहती है, कथित तौर पर उसी के स्थानीय तंत्र की नाक के नीचे भारत रत्न स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी जी की प्रतिमा को लेकर हुआ विवाद अब पार्टी को पूरी तरह ले डूबने के कगार पर ले आया है।
* कमीशनखोरी और कागजी कार्रवाई का खेल: कटघोरा नगर पालिका परिषद के अंतर्गत 'अटल परिसर' में अटल जी की भव्य कांस्य (ब्रॉन्ज) प्रतिमा लगाने के नाम पर लाखों रुपये की वित्तीय अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप सामने आए। पहली ही बारिश में प्रतिमा की ऊपरी परत बह गई और कांस्य की आड़ में घटिया सीमेंट-कंक्रीट का ढांचा उजागर हो गया।
* ठोस कार्रवाई न होना बना जी का जंजाल: इस अक्षम्य मामले में दोषियों पर कोई भी ठोस या दंडात्मक कार्रवाई न होना अब भाजपा के लिए सबसे बड़ा 'आत्मघाती' मुद्दा बन गया है। सरकार और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की ओर से मामले को रफा-दफा करने की कोशिशों ने आग में घी का काम किया है।
* चौक-चौराहों पर गूंज रही जनता की आवाज: क्षेत्र के चाय ठेलों और चौक-चौराहों पर अब सरेआम जनता के बीच यह तीखी चर्चा आम हो चुकी है कि—"जो नेता अपने आराध्य और देश के गौरव अटल जी के सम्मान के नहीं हुए, वे भला आम जनता के दुखों के क्या होंगे?" इस एक नारे ने स्थानीय स्तर पर भाजपा की 'साख पर ऐसी कालिख पोती है' जिसे धो पाना मौजूदा विधायक और संगठन के बस की बात नहीं लग रही।

रणनीति के मँजे हुए खिलाड़ी भाजपा जिलाध्यक्ष गोपाल मोदी की बिसात: क्या पलट पाएंगे गेम?
जहाँ एक तरफ भाजपा स्थानीय मुद्दों पर बैकफुट पर नजर आ रही है, वहीं दूसरी तरफ संगठन की कमान संभाल रहे भाजपा जिलाध्यक्ष गोपाल मोदी कांग्रेस के इस चक्रव्यूह को ध्वस्त करने के लिए परदे के पीछे से बड़ी गोटियां फिट कर रहे हैं। राजनीति के मँजे हुए खिलाड़ी और कुशल रणनीतिकार माने जाने वाले गोपाल मोदी को कोरबा जिले की कमान ही इसलिए सौंपी गई है ताकि वे डूबती नैया को पार लगा सकें।
* मोदी का 'माइक्रो-मैनेजमेंट': गोपाल मोदी ने कटघोरा में कांग्रेस की आक्रामकता को भांपते हुए सीधे बूथ स्तर पर 'सर्जिकल स्ट्राइक' शुरू कर दी है। हाल ही में घोषित की गई उनकी नई जिला कार्यकारिणी में युवाओं और नए चेहरों को तरजीह देकर उन्होंने पार्टी में नई ऊर्जा फूंकने का काम किया है।
* अटल विवाद का डैमेज कंट्रोल: अटल परिसर विवाद से उपजे जन-आक्रोश को थामने के लिए मोदी का रणनीतिक दिमाग सक्रिय हो चुका है। वे जनता के बीच राज्य सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं का रिपोर्ट कार्ड लेकर उतर रहे हैं, ताकि कथित भ्रष्टाचार के आरोपों की धार को कम किया जा सके।
* अंगद के पैर की तरह मुकाबला: व्यावसायिक और राजनीतिक रूप से बेहद सुदृढ़ पृष्ठभूमि रखने वाले गोपाल मोदी, कांग्रेस के रतन मित्तल के धनबल और पुरुषोत्तम कंवर के सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूले की काट निकालने के लिए अंदरूनी तौर पर जातीय और व्यापारिक समीकरणों को साध रहे हैं। विश्लेषकों का मानना है कि भले ही मैदान में विधायक प्रेमचंद पटेल हों, लेकिन असली मुकाबला कांग्रेस के दावेदारों और गोपाल मोदी की चुनावी बिसात के बीच होने वाला है।

2. रतन मित्तल: व्यापारिक साम्राज्य और शहरी वोट बैंक में सर्जिकल स्ट्राइक की ताकत
यदि कांग्रेस कटघोरा, छुरी, और बांकीमोंगरा जैसे शहरी एवं व्यापारिक क्षेत्रों में भाजपा के 'गढ़ में सेंध' लगाना चाहती है, तो रतन मित्तल कांग्रेस के लिए 'नहले पर दहला' साबित हो सकते हैं।
* असीमित चुनावी प्रबंधन: धनबल और चुनावी मशीनरी के मामले में भाजपा का डटकर मुकाबला करने के लिए रतन मित्तल को आर्थिक रूप से बेहद सक्षम माना जाता है।
* शहरी नेटवर्क की कमान: चेंबर ऑफ कॉमर्स और सामाजिक संस्थाओं में सक्रियता के कारण शहरी मतदाताओं और युवाओं के बीच इनकी साफ-सुथरी छवि है, जो भाजपा के पारंपरिक वैश्य (व्यापारी) वोट बैंक को 'ताश के पत्तों की तरह' बिखेरने का माद्दा रखती है।
'एक साधे सब सधे' की रणनीति
सियासी पंडितों का साफ कहना है कि कांग्रेस को किसी भी नए प्रयोग या 'सीट-बदलाव' के चक्कर में अपनी बनी-बनाई 'खिचड़ी' खराब नहीं करनी चाहिए:
1. पुरुषोत्तम कंवर कटघोरा की पिच पर कांग्रेस के सबसे भरोसेमंद खिलाड़ी हैं, जो जिला गठन के खोखले चुनावी वादों पर भाजपा को घेरकर ग्रामीण-आदिवासी वोटों को समेट सकते हैं।
2. मुकाबला हाई-टेक चुनाव प्रबंधन और शहरी मतों का हुआ, तो रतन मित्तल 'बाजीगर' साबित हो सकते हैं, जो व्यापारिक वर्ग को कांग्रेस के पाले में ला खड़ा करेंगे।

नतीजतन, अटल परिसर घोटाले में ठोस कार्रवाई न होने का गुस्सा और "जो अटल के नहीं, वो जनता के क्या होंगे" की गूंज ने भाजपा की राह मुश्किल कर दी है। हालांकि, राजनीति के चतुर सुजान भाजपा जिलाध्यक्ष गोपाल मोदी की नई व्यूह-रचना इस मुकाबले को बेहद दिलचस्प और कांटे का बना रही है। अब देखना यह है कि कांग्रेस अपने इन दो दिग्गजों के भरोसे किला फतह करती है या गोपाल मोदी की चुनावी बिसात भाजपा की लाज बचा ले जाती है।
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