कटघोरा: : "पहले लगाओ, फिर उखाड़ो" वन विभाग का कारनामा.! करोड़ो की योजना परिणाम शून्य.?
Shubh Arvind Sharma
Fri, Jul 10, 2026
कटघोरा: "पहले लगाओ, फिर उखाड़ो" वन विभाग का कारनामा.! करोड़ो की योजना परिणाम शून्य.?
रतनजोत पर विभाग ने फुके करोड़ो रूपये, अब उसी पर चली आरी.!
कोरबा/कटघोरा:-कटघोरा वन विभाग के भी गजब कारनामे है " पहले लगाओ, फिर उखाड़ो " छत्तीसगढ़ में एक समय जैव ईंधन और हरित विकास के नाम पर रतनजोत वृक्षारोपण का बड़ा अभियान चलाया गया था।उस दौर में करोड़ों रुपये खर्च कर हजारो हेक्टेयर भूमि पर रजतजोत के पौधे लगाए गए थे।वर्षों तक इसे सरकार की महत्वाकांक्षी योजना और सफल मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया गया था,लेकिन अब वही रतनजोत के पौधे काटकर नए वृक्षारोपण किये जाने से योजना की उपयोगिता और उस पर हुए सरकारी खर्च को लेकर गम्भीर सवाल उठने लगे हैं।

जानकारी के अनुसार, वनमंडल कटघोरा के वनपरिक्षेञ पसान, सर्किल सेमरा, परिसर सैला-कुटेलामुडा के आरक्षित वन क्षेत्र में लगभग 100 हे. में वर्ष 2008-09 के दौरान रतनजोत का वृक्षारोपण किया गया था।अब वर्ष 2025-26 में उसी वृक्षारोपण को काटकर नए पौधों का रोपण किया जा रहा है।

सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इसी वृक्षारोपण को वर्ष 2008-09 में उत्कृष्ट कार्य मानते हुये तत्कालीन कोरबा कलेक्टर अशोक अग्रवाल के द्वारा 15 अगस्त के अवसर पर आयोजित समारोह में वनपाल कोमल शर्मा को उत्कृष्ट वृक्षारोपण पुरुस्कार प्रदान किया गया था।उस समय तत्कालीन वनमंडलाधिकारी कपासी भी कार्यक्रम में उपस्थित थे।यदि यह वृक्षारोपण इतना उत्कृष्ट था कि उसे सम्मानित किया गया था तो आज उसे पूरी तरह काटने की आवश्यकता क्यों पड़ी.? यह प्रश्न अब स्थानीय लोगों और पर्यावरण से जुड़े जानकारों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।

इसी प्रकार वर्ष 2007-08 में वनपरिक्षेञ पसान के परिसर सेमरा बीट में किये गए रतनजोत वृक्षारोपण को भी काटकर वर्ष 2022-23 में नया वृक्षारोपण कर दिया गया।इससे यह सवाल और गहरा हो जाता है कि क्या राज्यभर में रतनजोत परियोजना पर खर्च की गई भारी-भरकम राशि का कोई दीर्घकालिक मूल्यांकन कभी किया गया.?

यदि करोड़ो रूपये की लागत से लगाये गए पौधों को कुछ वर्षों बाद ही हटाकर पुनः नए पौधो का वृक्षारोपण किया जा रहा है तो यह जानना आवश्यक हो जाता है कि क्या रतनजोत परीयोजना विफल रही? क्या इसके लिए किसी अधिकारी किसी एजेंसी की जबावदेही तय हुई,अथवा बिना किसी समुचित मूल्यांकन के सरकारी धन खर्च कर दिया गया.?

अब सवाल यह उठता है कि रतनजोत वृक्षारोपण को काटने की अनुमति किस सक्षम प्राधिकारी ने दी.? क्या शासन से विधिवत स्वीकृति प्राप्त हुई थी तथा पुराने वृक्षारोपण को हटाने के पीछे क्या तकनीकी या प्रशासनिक कारण दर्ज किए गए हैं।

यही जांच में यह सामने आता है कि बिना सक्षम अनुमति के करोड़ो रूपये की परिसंपत्तियो को हटाया गया अथवा परियोजना के मूल्यांकन में गम्भीर लापरवाही हुई,तो यह मामला केवल वनविभाग तक सीमित नही रहेगा,बल्कि सार्वजनिक धन के उपयोग और जबावदेही का बड़ा विषय बन सकता है।
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