विकास के नाम पर विनाश, खोखले वादे और जर्जर कटघोरा: : समस्याओं के चक्रव्यूह में फंसी जनता; हर मोर्चे पर मिल रहा धोखा, तलाश है किसी सच्चे खेवनहार की!
Shubh Arvind Sharma
Wed, Aug 26, 2026
विकास के नाम पर विनाश, खोखले वादे और जर्जर कटघोरा: समस्याओं के चक्रव्यूह में फंसी जनता; हर मोर्चे पर मिल रहा धोखा, तलाश है किसी सच्चे खेवनहार की!
कटघोरा।दावे आसमान के और जमीनी हकीकत पाताल की! विकास के लंबे-चौड़े ढोल पीटने वाले दावों और सुस्त प्रशासनिक तंत्र ने कटघोरा को बुनियादी समस्याओं के ऐसे दलदल में धकेल दिया है, जहाँ से निकलने का कोई रास्ता नजर नहीं आता। दशकों बीत गए, शासन-प्रशासन के चेहरे बदले, लेकिन कटघोरा की तकदीर पर जूं तक नहीं रेंगी। आज स्थिति यह है कि यहाँ की जनता हर कदम पर खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है और बुनियादी सुविधाओं के लिए दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर है।

हर कदम पर धोखा: व्यवस्था की मार झेलती जनता
कटघोरा का आम नागरिक सुबह जागने से लेकर रात को सोने तक समस्याओं के एक ऐसे दुष्चक्र में फंसा है, जहाँ उसकी कहीं कोई सुनवाई नहीं है:
* अस्पताल में मायूसी: जब कोई गरीब बीमारी से लाचार होकर सरकारी अस्पताल की चौखट पर जाता है, तो उसे इलाज और दवा के बजाय केवल बिलासपुर या कोरबा का 'रेफर कार्ड' थमा दिया जाता है। डॉक्टर और संसाधनों की कमी के कारण मरीज व्यवस्था के आगे खून के आंसू रोने को मजबूर है।
* नगर पालिका में चक्कर: अपने ही जायज कामों (जैसे प्रमाण पत्र या साफ-सफाई की अर्जी) के लिए जब जनता पालिका के दफ्तर जाती है, तो फाइलें कछुए की रफ्तार से चलती हैं। वहां सिर्फ आश्वासन मिलते हैं, सुनवाई नहीं।
* थाने में बेरुखी: किसी विपत्ति या शिकायत को लेकर जब आम आदमी थाने का रुख करता है, तो वहां का व्यवहार और कार्यप्रणाली उसके जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा काम करती है।हालांकि फेरबदल बाद व्यवस्था में कुछ सुधार है।
* सड़कों पर दर्द और अंधेरे का खौफ: दिन के उजाले में जर्जर और गड्ढों भरी सड़कों पर चलना जहाँ शरीर को तोड़ कर रख देता है, वहीं रात होते ही स्ट्रीट लाइटों के गायब होने से पूरा इलाका अंधेरे के आगोश में समा जाता है, जिससे राहगीरों के मन में डर बना रहता है।
* राशन और सरकारी योजनाओं के लिए मशक्कत: सरकारी योजनाओं का लाभ उठाना लोहे के चने चबाने जैसा कठिन हो गया है। राशन दुकान (सोसायटी) में अनाज के लिए घंटों कतारों में लगकर भारी मशक्कत करनी पड़ती है।
* शिक्षा के नाम पर लाचारी: सरकारी स्कूलों की बदहाली के बीच जब अभिभावक बच्चों को निजी स्कूलों में भेजते हैं, तो वहां की भारी-भरकम फीस और खर्चों के आगे स्कूल प्रबंधन के सामने नतमस्तक होने के अलावा कोई चारा नहीं बचता।
जनप्रतिनिधियों की बेरुखी और एक 'मसीहा' की तलाश
सबसे बड़ा झटका तब लगता है जब पीड़ित जनता अपनी फरियाद लेकर अपने ही चुने हुए जनप्रतिनिधियों के पास जाती है। वहां समाधान तो दूर, उल्टा दुर्व्यवहार और अहंकार का सामना करना पड़ता है। जीत के बाद नेता जनता से इस तरह नौ दो ग्यारह हो जाते हैं जैसे वे उन्हें जानते ही न हों।
इस चौतरफा प्रताड़ना को झेलने के बाद कटघोरा की जनता को शिद्दत से अहसास होता है कि काश! कटघोरा में कोई ऐसा मजबूत, दबंग और संवेदनशील नेता या व्यक्ति होता, जिसके सिर्फ खड़े हो जाने से प्रशासन की काठ मार जाती और जनता की हर समस्या का समाधान चुटकियों में हो जाता। एक ऐसे निडर नेतृत्व की तलाश आज हर कटघोरा वासी की आंख में साफ देखी जा सकती है।
प्रलोभन का शिकार जनता: 'अब पछताए होत क्या, जब चिड़ियां चुग गई खेत'
लेकिन ठहरिए! इस बदहाली की कहानी में केवल व्यवस्था को कोसने से काम नहीं चलेगा। इस दुर्दशा की जिम्मेदार जितनी प्रशासनिक विफलता है, उतनी ही गुनहगार यहाँ की जनता भी है। चुनाव आते ही कटघोरा के मतदाता अपने विवेक को ताक पर रख देते हैं। चुनाव के समय जब लोक-लुभावन घोषणाएं की जाती हैं या अस्थाई प्रलोभन दिए जाते हैं, तो जनता आँखें मूंदकर उनके जाल में फंस जाती है।
उम्मीदवारों के पिछले पांच साल का रिपोर्ट कार्ड देखने के बजाय चंद वादों के आगे घुटने टेककर जनता खुद अपने हाथों से अपनी तकदीर पर कुल्हाड़ी मार लेती है। प्रलोभन का शिकार होकर गलत हाथों में जिम्मेदारी सौंपने के बाद, जब पांच साल तक विकास के नाम पर केवल कोरे आश्वासन मिलते हैं, तब यही जनता अपना सिर पीटती है।

कब जागेगा कटघोरा?
चुनावी नुमाइंदे तो जनता के वोटों से जीतकर ऐश-ओ-आराम की जिंदगी जी रहे हैं, लेकिन कटघोरा की जनता आज भी नरकीय जीवन जीने को मजबूर है। स्थानीय नागरिकों में अब अंदर ही अंदर आक्रोश का लावा उबल रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह गुस्सा सिर्फ चाय की टपरियों तक सीमित रहेगा या फिर अगले चुनाव में जनता इस कुंभकर्णी नींद से जागेगी? अगर इस बार भी प्रलोभन के जाल में फंसकर मक्खी निगलने का काम किया गया, तो कटघोरा का भगवान ही मालिक है।
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कोरबा कटघोरा
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