Wednesday 9th of September 2026

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डिलीवरी मरीज से ₹5,500 की कथित लूट; सवाल पूछने पर भीगी बिल्ली बने साहब!

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पाली अस्पताल में BMO अनिल श्रॉफ की तानाशाही चरम पर, : डिलीवरी मरीज से ₹5,500 की कथित लूट; सवाल पूछने पर भीगी बिल्ली बने साहब!

Shubh Arvind Sharma

Wed, Sep 9, 2026

पाली अस्पताल में BMO अनिल श्रॉफ की तानाशाही चरम पर, डिलीवरी मरीज से ₹5,500 की कथित लूट; सवाल पूछने पर भीगी बिल्ली बने साहब!

👉 लूट का अड्डा बना पाली अस्पताल: बिलासपुर से खून मंगाने के नाम पर गरीब प्रसूता के परिजनों की जेब पर डाका डालने का आरोप, बिना रसीद के ऐंठे 5,500 रुपये।

👉अस्पताल में नरक जैसे हालात: हर तरफ गंदगी का अंबार, बिजली गुल होते ही व्यवस्थाएं ठप्प; उमस और गर्मी में उबल रहे मरीज।

👉 नशे का अवैध कारोबार: अस्पताल परिसर की कैंटीन में धड़ल्ले से बिक रहे नशीले पदार्थ, कार्रवाई के सवाल पर बीएमओ ने कहा– "देखना होगा, मैं देख लूंगा!"

👉 साहब के लिए 'स्वर्ग', जनता के लिए 'नरक': डॉक्टरों और बीएमओ के चैंबर में वीआईपी (VIP) चकाचौंध, वार्डों में तड़प रहे बेबस बीमार।

👉 सवालों की बौछार से फूले हाथ-पांव: अवैध वसूली और बदहाली पर जब पत्रकारों ने कसा शिकंजा, तो 'जज मैडम' का झूठा बहाना बनाकर घिरे बीएमओ।

पाली (कोरबा)8 सितंबर 2026 वेब डेस्क: छत्तीसगढ़ के पाली विकासखंड का मुख्य सरकारी अस्पताल इन दिनों 'अंधेर नगरी, चौपट राजा' की कहावत को चरितार्थ कर रहा है। ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर (BMO) डॉ. अनिल श्रॉफ की कथित तानाशाही और लचर प्रशासनिक रवैये ने पूरे महकमे की साख को बट्टा लगा दिया है। सरकारी दावों और मुफ्त इलाज की योजनाओं को ठेंगा दिखाते हुए इस अस्पताल को मानो अवैध उगाही, गंदगी और नशे का केंद्र बना दिया गया है। नियम-कानूनों को ताक पर रखकर अपनी ढपली-अपना राग अलाप रहे बीएमओ के नाक के नीचे गरीब जनता के खून-पसीने की कमाई पर डाका डाला जा रहा है, परिसर में खुलेआम नशा बिक रहा है और मरीज नरकीय जीवन जीने को मजबूर हैं।

मजबूरी का फायदा: डिलीवरी मरीज से ₹5,500 की 'उगाही' का आरोप, रसीद के नाम पर सांप सूंघा!

अस्पताल परिसर में जारी इस कथित गोरखधंधे का भंडाफोड़ तब हुआ जब एक बेबस मरीज के परिजन का सब्र का बांध टूट गया। पीड़ित परिजन ने आरोप लगाया कि उन्होंने प्रसव (डिलीवरी) के लिए अपने मरीज को अस्पताल में भर्ती कराया था। डॉक्टरों ने जब ऑपरेशन के लिए खून की जरूरत बताई, तो अस्पताल प्रबंधन के कुछ कारिंदों ने आपदा को अवसर में बदलते हुए बिलासपुर से ब्लड मंगवाने के नाम पर 5,500 रुपये की मोटी रकम ऐंठ ली।

हद तो तब हो गई जब इतनी बड़ी रकम डकारने के बाद भी परिजनों को एक ढेला की रसीद नहीं दी गई। इस बीच पैसों के जुगाड़ और खून के इंतजार में प्रसूता दर्द से तड़पती रही और अस्पताल प्रबंधन चैन की बंसी बजाता रहा। जब मौके पर मौजूद पत्रकारों ने इस कथित वसूली को लेकर बीएमओ डॉ. अनिल श्रॉफ को घेरा, तो उनके हाथ-पांव फूल गए। पैसों के गबन और रसीद न दिए जाने के सवाल पर बीएमओ पूरी तरह सकपका गए और अपनी चमड़ी बचाने के लिए तुरंत पलटी मारते हुए जिला अस्पताल से ब्लड मंगाने की दुहाई देने लगे।

अस्पताल में इलाज या नशे का कारोबार? कैंटीन में बिक रहा ज़हर, सवाल पर बीएमओ के छूटे पसीने!

अस्पताल परिसर में जारी अंधेरगर्दी यहीं खत्म नहीं होती, यहां तो 'चिराग तले अंधेरा' वाली कहावत सच साबित हो रही है। जहां लोग बीमारी से ठीक होने आते हैं, उसी अस्पताल परिसर के अंदर संचालित कैंटीन में धड़ल्ले से नशीले पदार्थ बेचे जा रहे हैं। जब पत्रकारों ने अस्पताल के भीतर चल रहे इस अवैध नशे के कारोबार पर बीएमओ को घेरा, तो उन्होंने बेहद सफाई से पल्ला झाड़ते हुए कहा कि "कैंटीन टेंडर के तहत संचालित है।"

लेकिन जैसे ही पत्रकारों ने गड़े मुर्दे उखाड़ना शुरू किए और कैंटीन संचालन के नियमों व टेंडर की शर्तों पर कड़े सवाल दागे, तो बीएमओ साहब के माथे पर पसीना आ गया। घबराहट में साहब के तोते उड़ गए और वे एक बार फिर उलूल-जुलूल बयानबाजी पर उतर आए। जब बीएमओ को इस गंभीर मामले पर तुरंत संज्ञान लेने और कार्रवाई करने को कहा गया, तो उनका जवाब घोर लापरवाही और बेशर्मी से भरा था। साहब ने बेहद गैरजिम्मेदाराना लहजे में कहा— "आपने बता दिया है, मेरे को देखना होगा, मैं देख लूंगा!" यह ढीला रवैया साफ दर्शाता है कि अस्पताल परिसर में अवैध रूप से बिक रहे नशीले पदार्थों को बीएमओ का मौन संरक्षण प्राप्त है।

अस्पताल में गंदगी का साम्राज्य, साहब के चैंबर में 'वीआईपी' चकाचौंध!

अस्पताल की सफाई व्यवस्था की पोल इस कदर खुल चुकी है कि चारों तरफ गंदगी का आलम है। दुर्गंध और कचरे के ढेर के बीच मरीज और ज्यादा बीमार होने को मजबूर हैं। हैरान करने वाली बात यह है कि जहां एक तरफ गरीब मरीजों के वार्ड बदहाली के आंसू रो रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ डॉक्टरों और बीएमओ के चैंबरों की व्यवस्था अच्छी-खासी और चकाचक है। साहब ने अपने आराम के लिए चैंबर को तो महल जैसा बना रखा है, लेकिन अस्पताल की बुनियादी सफाई को भगवान भरोसे छोड़ दिया है।

बिजली गुल तो व्यवस्था ठप्प, उमस और गर्मी में उबले मरीज

अस्पताल की लापरवाही का आलम यहीं खत्म नहीं होता। जैसे ही बिजली गुल होती है, अस्पताल की पूरी व्यवस्था ताश के पत्तों की तरह ढह जाती है। बैकअप के नाम पर अस्पताल प्रबंधन हाथ पर हाथ धरे बैठा रहता है। कड़कड़ाती धूप और भयानक उमस के बीच मरीज बिस्तर पर पड़े-पड़े गर्मी से उबलते रहते हैं, लेकिन बीएमओ साहब के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती। बीएमओ के इस अड़ियल व्यवहार और अस्पताल की दुर्दशा ने पूरे विभाग की पोल खोलकर रख दी है।

पत्रकारों को देख भीगी बिल्ली बने साहब, 'जज मैडम' के नाम पर काटा कल्टी!

जब इस अवैध वसूली, गंदगी और कैंटीन में नशे की बिक्री की भनक लगते ही स्थानीय पत्रकार धरातल की हकीकत जानने अस्पताल पहुंचे, तो बीएमओ डॉ. अनिल श्रॉफ का अहंकार सातवें आसमान पर था। शुरुआती दौर में तो साहब शेर बनते हुए बोले— "जो पूछना है पूछो!" और हवा में तीर चलाते हुए अपनी ही बड़बड़ाहट शुरू कर दी। लेकिन जैसे ही पत्रकारों ने एक-एक कर उनकी नाकामियों का कच्चा चिट्ठा सामने रखा, साहब के चेहरे की हवाइयां उड़ने लगीं

जब तीखे सवालों से घिरे साहब को लगा कि अब काटो तो खून नहीं, तो उन्होंने कैमरे से रफूचक्कर होने के लिए एक नया शिगूफा छोड़ दिया। पत्रकारों को उलझाते हुए बोले, "मुझे देरी हो रही है, जज मैडम के नाक से खून निकल रहा है और उन्होंने मुझे तुरंत बुलाया है, जल्दी जाना है।"

सुलगता सवाल: आखिर कौन हैं वो 'जज मैडम' जिनका नाम लेकर साहब को नहीं आई रत्ती भर बेशर्मी?

बीएमओ अनिल श्रॉफ के इस बचकाने बयान के बाद अब पूरे क्षेत्र में यह सवाल आग की तरह फैल रहा है कि आखिर वह कौन सी 'जज मैडम' हैं, जिनके नाम का सहारा लेकर साहब ने ऑन-कैमरा इतनी बड़ी कहानी गढ़ दी? एक तरफ तो साहब कैमरे के सामने यह दावा करते रहे कि स्थिति बेहद आपातकालीन है, लेकिन दूसरी तरफ उनके चेहरे पर न तो कोई चिंता दिखी, न डर और न ही कोई बेशर्मी महसूस हुई।

झूठ का ऐसा नंगा नाच पहले कभी नहीं देखा गया, जहां मीडिया के तीखे सवालों से बचने के लिए सीधे न्यायपालिका से जुड़े एक गरिमामय पद का इस्तेमाल ढाल की तरह कर दिया गया। हैरान करने वाली बात यह रही कि इतना गंभीर बहाना बनाने के बावजूद वे अस्पताल परिसर में ही डटे रहे। वे न तो कथित तौर पर बीमार 'जज मैडम' के इलाज के लिए गए और न ही मौके पर मौजूद पत्रकारों के सवालों का कोई सिर-पैर का जवाब दे पाए। इस ढुलमुल रवैये से यह साफ हो गया कि साहब केवल अपनी नाकामी, भ्रष्टाचार और अस्पताल की गंदगी पर पर्दा डालने के लिए प्रशासनिक अधिकारियों के नाम का झूठा सहारा ले रहे थे।

शासन-प्रशासन पर धब्बा: सरकार की योजनाओं को कब तक चूना लगाते रहेंगे ऐसे अधिकारी?

डॉ. अनिल श्रॉफ जैसे गैरजिम्मेदार अधिकारियों के इसी अड़ियल और कथित भ्रष्ट रवैये के कारण आज जिला प्रशासन और सूबे की सरकार की छवि पूरी तरह धूमिल हो रही है। एक तरफ सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए करोड़ों का बजट पानी की तरह बहा रही है, वहीं दूसरी तरफ ऐसे अधिकारी सरकारी योजनाओं को सरेआम पतीला (चूना) लगा रहे हैं।

साहब की इस मनमानी की सीधी मार उन गरीब मरीजों पर पड़ रही है जो बुनियादी इलाज और खून के लिए तड़प रहे हैं। डॉ. अनिल श्रॉफ जैसे संवेदनहीन अधिकारी किसी भी सरकारी अस्पताल के नाम पर एक काला धब्बा हैं। क्षेत्र की त्रस्त जनता अब सीधे मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री से तीखा सवाल पूछ रही है— क्या जिला प्रशासन इस खुली गुंडागर्दी, कथित अवैध वसूली और परिसर में बिक रहे नशे पर संज्ञान लेगा, या फिर ऐसे मठाधीश अधिकारी यूं ही जनता को लूटते रहेंगे और सरकार की साख को मिट्टी में मिलाते रहेंगे?

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कोरबा कटघोरा

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