कटघोरा महा-धमाका:हार के बाद जागे पूर्व विधायक पुरुषोत्तम कंवर; : पालिका अध्यक्ष ने हनुमानगढ़ी में 'री-लॉन्च' कर सुलगाई सियासत की भट्टी, भाजपाई भी चमकाने पहुँचे अपनी जंग लगी राजनीति!
Shubh Arvind Sharma
Sat, Sep 5, 2026
कटघोरा महा-धमाका:हार के बाद जागे पूर्व विधायक पुरुषोत्तम कंवर; पालिका अध्यक्ष ने हनुमानगढ़ी में 'री-लॉन्च' कर सुलगाई सियासत की भट्टी, भाजपाई भी चमकाने पहुँचे अपनी जंग लगी राजनीति!
कहते हैं राजनीति में कोई हमेशा के लिए नहीं सोता और न ही कोई हमेशा के लिए विरोधी रहता है—बस सही 'खाद-पानी' और कैमरे की फ्लैशलाइट मिलने का इंतजार होता है! कटघोरा के पावन हनुमानगढ़ी मंदिर परिसर से एक ऐसा सियासी उलटफेर सामने आया है, जिसने पूरे इलाके में "अंधा बांटे रेवड़ी, फिर-फिर अपनों को दे" वाली कहावत चरितार्थ कर दी है। मौका तो वैसे 'वृक्षारोपण' का था, लेकिन भीतर की बात यह है कि यहाँ पौधे की आड़ में मुरझाए और जंग खाए हुए राजनीतिक भविष्य को चमकाने का खेल खेला गया है।

हनुमानगढ़ी में "बगल में छुरी, मुंह में राम!" और भाजपाइयों का "गंगा गए तो गंगादास..."
पहली तस्वीर गवाह है कि कटघोरा के नगर पालिका अध्यक्ष और भाजपा-कांग्रेस के दिग्गज नेताओं व कार्यकर्ताओं ने मंदिर के फर्श पर ऐसा आसन जमाया, मानो इनसे बड़ा 'संत' इस धरा पर कोई दूसरा है ही नहीं। कल तक जो भाजपाई विपक्ष की कमियों को कोसते नहीं थकते थे, वे आज "दूध और पानी" की तरह कांग्रेसी खेमे से मिले हुए दिखे। सत्ता की मलाई में मदमस्त भाजपा के नेताओं को देखकर जनता कह रही है कि ये तो "गंगा गए गंगादास, जमुना गए जमुनादास" वाली नीति पर चल रहे हैं। विपक्ष से हाथ मिलाने और फोटो खिंचाने की इतनी जल्दी थी कि अपनी पार्टी की विचारधारा को भी खूंटी पर टांग आए!
"गहरी नींद से जागे लाला, तो हाथ में थाम डाला गमला!"
इस पूरे ड्रामे का मुख्य आकर्षण रहे पूर्व कांग्रेसी विधायक पुरुषोत्तम कंवर विधानसभा चुनाव में मिली करारी और ऐतिहासिक हार के बाद कंवर साहब ऐसे "नौ दो ग्यारह" हुए थे कि माना जा रहा था वे स्थायी 'कुंभकर्णी निद्रा' में लीन हो चुके हैं। लेकिन धन्य हो नगर पालिका अध्यक्ष जी का, जिन्होंने "मुर्दे में जान फूंकने" की कला दिखाते हुए इस आयोजन के बहाने पूर्व विधायक जी को दोबारा मार्केट में 'लांच' कर दिया। जो साहब महीनों से कटघोरा की जनता के सुख-दुख से नदारद थे, वे अचानक पर्यावरण के मसीहा बनकर प्रकट हो गए।
यक्ष प्रश्न: दोनों धुर विरोधियों का यह 'इलू-इलू' प्रेम देखकर जनता अब क्या समझे?
तस्वीरों में भाजपा और कांग्रेस के नेताओं को गले में बाहें डाले और एक साथ फर्श पर मुस्कुराते देख कटघोरा की जनता का सिर चकरा गया है। अब जनता के मन में गंभीर सवाल उठ रहे हैं:
* "हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और?" जनता सोच रही है कि जो नेता मंच पर आकर एक-दूसरे को पानी पी-पीकर कोसते हैं, क्या वे बंद कमरों में और हनुमानगढ़ी के कोनों में "भीतर-भीतर सब एक हैं"?
* "नूरा-कुश्ती का खेल?" आम लोग खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं कि चुनाव में हम तो इन पार्टियों के चक्कर में आपस में लड़ मरते हैं, और यहाँ ये बड़े नेता आपस में "भाई-भाई" बनकर फोटो खिंचा रहे हैं।
* "चोर-चोर मौसेरे भाई?" जनता यह समझने पर मजबूर हो गई है कि जब बात पब्लिसिटी लूटने और अपने ढीले पड़ चुके राजनीतिक रसूख को बचाने की आती है, तो इन नेताओं के लिए न कोई 'पंजा' (कांग्रेस) मायने रखता है और न कोई 'कमल' (भाजपा)। दोनों दल "एक ही थाली के चट्टे-बट्टे" बनकर जनता की आंखों में धूल झोंकने के लिए हाथ मिला लेते हैं।
भाजपा नेताओं पर तीखा प्रहार: "घर का जोगी जोगड़ा, आन गांव का सिद्ध!"
कांग्रेसी तो अपनी खोई हुई जमीन तलाश रहे हैं, लेकिन भाजपा के नेताओं को क्या सांप सूंघ गया था जो वे इस 'री-लॉन्चिंग' इवेंट में ताली बजाने पहुंच गए? जनता तंज कस रही है कि कटघोरा में स्थानीय मुद्दों और विकास पर बात करने के समय जो भाजपाई "घड़ियाली आंसू" बहाते हैं या फिर "चुपड़ी-चुपड़ी बातें" करके निकल लेते हैं, वे आज विपक्ष के नेता को ऑक्सीजन देने के लिए खुद ढाल बनकर खड़े हो गए। भाजपा के इन सूरमाओं को देखकर ऐसा लगा कि ये सिर्फ "दीपक तले अंधेरा" फैलाना जानते हैं—अपने क्षेत्र की सुध लेने की बजाय, कांग्रेसियों के साथ जुगलबंदी कर अपनी बची-कुची पब्लिसिटी चमकाने में मशगूल हैं।

"अब दोष सत्तापक्ष को दें या विपक्ष को, आखिर कौन सुनेगा जनता का दुखड़ा?"
इस पूरी जुगलबंदी को देखकर कटघोरा की बेबस जनता अब गहरे असमंजस में है। सबसे बड़ा दर्द यह है कि "अब रोएं तो किसके आगे रोएं?"
* अगर विकास कार्यों में देरी, बदहाल सड़कों और स्थानीय समस्याओं के लिए सत्तापक्ष (भाजपा) को घेरने जाओ, तो वे विपक्ष के साथ गलबहियां करते दिखते हैं।
* अगर जनता की आवाज उठाने के लिए विपक्ष (कांग्रेस) के पास उम्मीद लेकर जाओ, तो उनके अपने नेता चुनाव हारने के बाद कुंभकर्णी नींद सो जाते हैं और जागते भी हैं तो सिर्फ फोटो सेशन के लिए!
जब रक्षक और भक्षक, सत्तापक्ष और विपक्ष, दोनों ही "एक ही सिक्के के दो पहलू" बन जाएं, तो जनता की बुनियादी समस्याओं पर बात कौन करेगा? कटघोरा का आम नागरिक अब ठगा सा खड़ा पूछ रहा है—"जब काजी और चोर दोनों गले मिल जाएं, तो फरियादी न्याय की भीख किससे मांगे?"

एक छोटा सा पौधा और "एक अनार, सौ बीमार!"
दूसरी तस्वीर तो सोशल मीडिया पर मीम्स का खजाना बन चुकी है। एक नन्हे से पौधे को मिट्टी में दबाने के लिए पूर्व विधायक, पालिका अध्यक्ष और सत्ताधारी भाजपा व विपक्ष के कार्यकर्ताओं ने ऐसे हाथ आजमाया है जैसे यही पौधा कटघोरा को रातों-रात स्वर्ग बना देगा। हालत यह थी कि "करे कोई, भरे कोई"—मेहनत बेचारे माली की और फोटो का मलाईदार क्रेडिट लेने के लिए नेताओं की उंगलियां आपस में गुथमगुत्था थीं।
कटघोरा की जनता के तीखे बोल:
सब्जी मंडी से लेकर चौक-चौराहों तक लोग चुटकियां ले रहे हैं, "अध्यक्ष जी ने गजब का जादू मारा है, सोए हुए पूर्व विधायक को जगाया सो जगाया, साथ में भाजपाइयों को भी उनकी आरती उतारने के लिए लाइन में खड़ा कर दिया!" जनता भली-भांति जानती है कि यह सब "चुनावी मेंढकों" का कमाल है, जो मौसम बदलते ही टर्र-टर्र करने के लिए बिलों से बाहर आ जाते हैं। पौधे को ऑक्सीजन मिले न मिले, इन सब नेताओं को इसके सहारे "डूबती नैया पार लगाने" के लिए राजनीतिक ऑक्सीजन जरूर मिल गई है।
अब देखना यह होगा कि हनुमानगढ़ी में माथा टेकने और इस 'री-लॉन्चिंग' के ड्रामे के बाद जागे हुए पूर्व विधायक और मौकापरस्त भाजपाई सचमुच जनता के बीच "पैर पसारते हैं" या फिर फोटो का फ्लैश खत्म होते ही वापस "घोड़े बेचकर सो जाते हैं!"
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कोरबा कटघोरा
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